
शेहेर की भीड़ से होकर जब आप घर पोहोचते है, तब उलझे से मन में कई सारे सवाल आते है। दिन भर के काम में ना जाने कितनी ऐसी घटनाए घटती हैं, जो हमें अनचाही चीजों के बारे में सोचने पर मजबूर कर देती हैं।
फिर हमे कई परिवर्तन महसूस होने लगते हैं । एक समय जब सड़के और ट्रेने खाली हुआ करती थी, आज उन्ही सडको और ट्रेनों में हझारो की संख्या में लोग गुजरते हैं। ऐसे में कोई कही गिर जाता है, तो कोई उसे संभालने भागता है । और हम सोचते है कि इंसानियत के तौर पर आज भी इस संसार में कुछ बचा है। कई घटनाए ऐसी भी, जिन्हें देखकर इंसान की क्रूरता और निर्दयता महसूस होती है, और उसके सामंजस्य पर संकोच होने लगता हैं ।
कल ही की बात हैं। सुबह उठकर मैं दूध खरीदने गया था। घर के पीछे वाली गली से गुजरता, पंछियों की चहक सूनता हुआ मैं निकला। दूध लेकर वापस उस गली से गुजरा तो सामने एक विकृत दृश्य मैंने देखा। खून से लथपथ बिल्ली का एक बच्चा सड़क के बीचो बिच तड़प रहा था। दर्द से बेहाल वह बच्चा वही सड़क पर लेटा अपने सर के बल घूम रहा था। किसीने बताया, कि एक रिक्षा ने उसे ठोकर मार दी थी। उसके कान के निचे से खून आ रहा था। खून भरे उस जीव को देखकर तो लोग दूर ही रेह गए। दूर से देखने वाले उन लोगो को देखकर बहुत गुस्सा आया। कोई उसकी मदद करना नाही चाह रहा था। मैं जैसे जैसे उसकी ओर बढ़ा, वह दृश्य और भी दर्दनाक और डरावना होता गया।
घर वापस लौटना था, हाथ मे दूध का थैला, मन मे उस बच्चे की सहायता करने की इच्छा...पर मैंने कुछ नही किया। हाथ पर हाथ धरे बस उसे तड़पता हुआ देखता रहा और कुछ देर बाद दर्द सेहेन न कर पाने के कारण वो बेहोश हो गया या शायद मर गया। और फिर भी मैंने उस बच्चे को हाथ तक नही लगाया...कारण? नही जानता...
शायद बदलती हुई इस दुनिया मे, मैं भी कही बदल गया। प्रेम,दया और इन जैसी कई भावनाओ की जगह निर्दयता और अपक्षपात ने ले ली है। शेहेर की भाग दौड़ मे, मैंने भी गंभीर चीजों को नजर अंदाज़ करना सीख लिया। अपने काम से मतलब रखना, दुसरो के दुःख को तब तक संभालना जब तक वो हमारे हाथों को मैला न करे। इन्ही बुनियादों पर चलने वाली इस बेरहम दुनिया को गालीया देने वाला 'मैं' उसी दुनिया का हिस्सा कब बन गया पता तक नही चला।
और मैं बस कहा करता था....
" कितना बदल गया इंसान!!!"
-वैभव सोरटे



